Tuesday , 21 May 2019
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बिहार के दांडी गढ़पुरा में हिली थी ब्रिटिश साम्राज्य की नींव

बिहार के दांडी गढ़पुरा में हिली थी ब्रिटिश साम्राज्य की नींव

बेगूसराय, 20अप्रैल (उदयपुर किरण). इतिहास के घटनाक्रम को बेगूसराय सदा प्रभावित करता रहा. यह कभी मूकदर्शक नहीं रहा. यह अपनी सांस्कृतिक विरासत, संपन्नता, राजनीतिक चेतना और क्रांतिकारी विचार धाराओं के लिए सदा से जाना जाता है. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी यहां के लोगों ने उत्कृष्ट भूमिका निभाई. गांधीजी के आह्वान पर नमक सत्याग्रह आंदोलन में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया तथा डॉ श्री कृष्ण सिंह ने इसे अपनी कर्मभूमि बनाकर संवारा. 21 अप्रैल 1930 का वह स्वर्णिम दिन मुंगेर जिले का (वर्तमान में बेगूसराय) के गढ़पुरा का नाम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षर से अंकित हो गया था जब महात्मा गांधी के आह्वान पर बिहार केसरी डॉ श्री कृष्ण सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के काले कानून के खिलाफ नमक बनाकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी. डीएम ली साहब और एसपी मथुरा प्रसाद के आदेश पर गोरे सिपाहियों ने शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे मां भारती के सपूतों पर बर्बरतापूर्वक लाठी चार्ज कर दिया था.

खौलते कड़ाह में गिरकर श्री बाबू समेत कई सत्याग्रह घायल हो गए, जेल गए लेकिन नमक बनाने का काम नहीं रुका. महीनों तक लगातार नमक बनाकर गांव-गांव में पुड़िया बना कर भेजा जाता रहा. आज भी यह नमक सत्याग्रह स्थल बिहार में दांडी की याद दिलाता है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब इसकी ऐतिहासिकता की जानकारी मिली तो उन्होंने इसे राष्ट्रीय मानचित्र पर स्थापित करने के प्रयास शुरू किए. स्थल पर भवन निर्माण हो चुका है.अंग्रेजों ने नमक बनाने से रोकने के लिए जब कड़ा कानून बनाया था तो महात्मा गांधी ने इसका कड़ा विरोध किया और 12 मार्च 1930 को दांडी के लिए प्रस्थान कर गए. छह अप्रैल को दांडी पहुंचकर उन्होंने जब नमक बनाकर नमक कानून भंग किया तो देश में क्रांति की आग फैल गई. कोने-कोने में नमक कानून तोड़ो अभियान शुरू हो गया और इस अभियान की लौ बिहार भी पहुंची. जहां मुंगेर में जिला परिषद के अध्यक्ष मोहम्मद शाह जुबेर और उपाध्यक्ष डॉ श्री कृष्ण सिंह ने इसकी कमान संभाली.

13 अप्रैल 1930 को मुंगेर जिला कांग्रेस की बैठक में गढ़पुरा निवासी बिंदेश्वरी प्रसाद सिंह के प्रस्ताव पर नमक कानून भंग करने के लिए सर्वसम्मति से गढ़पुरा का चयन किया गया जिसके बाद 17 अप्रैल 1930 को कष्टहरणी घाट पर गंगा में प्रवेश कर श्री बाबू ने नमक कानून भंग करने की शपथ ली और लोग गढ़पुरा की ओर चल पड़े. रास्ते में लोग साथ होते गए, कारवां बढ़ता गया. गोगरी निवासी सुरेश मिश्रा, सूर्यगढ़ा के वासुकी राय, बड़हिया के चू भाई, बीहट के राम चरित्र सिंह, सदानंदपुर के ब्रह्मदेव सिंह, मेधौल के रामाधीन सिंह, बलदेव सिंह, मंझौल के राम किशोर सिंह, कमलेश्वरी सिंह, सूर्य नारायण सिंह, पहसारा के विष्णु देव सिंह समेत एक हजार से अधिक लोगों के साथ श्री बाबू 20 अप्रैल की शाम गढ़पुरा पहुंचे जहां दामोदर सिंह, बनारसी सिंह, जगदंबी सिंह, परमेश्वरी चौधरी, महावीर सिंह, कारी सिंह, नूनू चौधरी आदि ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. गढ़पुरा ठाकुरबाड़ी में पड़ाव डाला गया तथा महंत सुखराम दास ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर राशन-अवासन की व्यवस्था की थी. पूर्व में दी गयी सूचना के आधार पर एसपी, डीएसपी, एसडीओ भी बड़ी संख्या में फौज लेकर गढ़पुरा पहुंच गए लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें पानी- पानी कर दिया. गढ़पुरा डाकबंगला छोड़कर गांव की सभी कुएं में गोबर और किरासन तेल डाल दिया गया.

21 अप्रैल को जब नोनियां गाछी में नमक बनाने का काम शुरू हुआ तो हजारों हजार की भीड़ जुट गई थी. लेकिन प्रशासन को दिए निर्धारित संख्या से अधिक लोगों को जुटाकर आप कानून का उल्लंघन कर रहे हैं. श्री बाबू ने कहा था सत्याग्रह 30 लोग ही करेंगे लेकिन यह भीड़ इसलिए जुटी है कि अगर 30 लोग मारे जाएं तो भी नमक बनाने का सिलसिला रुके नहीं. जब नमक बनाने का कार्य शुरू हो गया तो अंग्रेजी फौज ने बर्बरता पूर्वक लाठी चार्ज किया. लोग घायल हुए, लेकिन किसी ने भी प्रतिकार नहीं किया क्योंकि सभी लोग पहले ही निर्णय ले चुके थे कि गोरी सरकार चाहे गोली से उड़ा दे मगर हम में से कोई नौजवान इसका प्रतिकार नहीं करेगा, पुलिस पर ढेला तक नहीं चलाएगा, और वही हुआ भी. सत्याग्रही का जत्था जब मुंगेर से चला था तो श्रीबाबू ने कहा था कि ‘आज जिस रास्ते से मैं फूलों की माला पहन कर जा रहा हूं, उसी रास्ते से कल मुझे आप जंजीरों में जकड़ा हुआ लौटते देखेंगे.’ सत्याग्रह के दौरान जंजीर तो नहीं डाली गई लेकिन गढ़पुरा में श्रीबाबू के साथ काफी सख्ती की गई. जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई तो वे चूल्हे पर चढ़े हुए कड़ाह में गिर गए और सिपाहियों ने उन्हें जानवर की तरह घसीटा. जनता रोती रही, परंतु श्रीबाबू की आंखों से आंसुओं की एक बूंद भी नहीं गिरी. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने तो लिखा भी था ‘स्वराज्य-संयुग के योद्धा, सिंह-निहिंसन-वृत्ति-वितृष्णा, लो स्वीकार करो हे विजयी, इस जन का भी जय श्रीकृष्ण.’


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