Wednesday , 16 October 2019
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‘पेट में फटे र्हुए एओटिक एन्यूरिज्म की राज्य में प्रथम सफल सर्जरी’

‘पेट में फटे र्हुए एओटिक एन्यूरिज्म की राज्य में प्रथम सफल सर्जरी’

उदयपुर। केवल 50 से 60 प्रतिशत मरीज हाॅस्पिटल पहुँच पाते है, उनमें से कुछ ही हाॅस्पिटल के आॅपरेशन थियेटर में सर्जरी के लिए जा पाते है तथा उनमें से बहुत कम लोग स्वस्थ हो कर घर जा पाते है। इसी चक्र को पूर्णतः पार कर 75 वर्षीय रोगी के पेट में स्थित फटे हुए एन्यूरिज्म (एबडोमिनर्ल एओटिक एन्यूरिज्म) की सफल सर्जरी कर गीतांजली मेडिकल काॅलेज एवं हाॅस्पिटल के कार्डियक सेंटर के कार्डियक थोरेसिक एवं वेसक्यूलर सर्जन डाॅ संजय गांधी व उनकी टीम ने मूमकिन साबित कर राजस्थान के चिकित्सा इतिहास में एक नया रिकाॅर्ड कायम किया है।

जिला निवासी शंकर, उम्र 75 वर्ष (परिवर्तित नाम) काफी लम्बे समय से पेट में एसिडिटी की शिकायत से परेशान थे अन्यथा चलने-फिरने में उन्हें कोई परेशानी नहीं थी वह स्वस्थ थे। अचानक पेट में बहुत तेज दर्द के कारर्ण एओटा में स्थित एन्यूरिज्म के फट जाने से पूरे शरीर में भारी मात्रा में रक्तस्त्राव शुरु हो गया जिससे उन्हें आपातकालीन स्थिति में गीतांजली हाॅस्पिटल में बेहोशी की हालत में लाया गया। उस वक्त उनका ब्लड प्रेशर 60 से 70 के बीच में था और हीमोग्लोबिन मात्र 5 ग्राम था। बिना देर किए उन्हें आॅपरेशन थियेटर में सर्जरी के लिए लिया गया। जहां डाॅ गांधी व उनकी टीम कार्डियक थोरेसक एवं वेसक्यूलर सर्जन डाॅ सुरेंद्र पटेल, कार्डियक एनेस्थेटिस्ट डाॅ अंकुर गांधी, डाॅ कल्पेश मिस्त्री, डाॅ मनमोहन जिंदल एवं डाॅ ताशा पुरोहित ने रोगी के पेट में फटे हुए एन्यूरिज्म का इलाज किया। डाॅ गांधी ने बताया कि पेट में चीरा लगाते ही एन्यूरिज्म जो फट चुका था उससे अत्यधिक रक्तस्त्राव शुरु हो गया, जिसे एक फौली कैथेटर द्वारा नियंत्रित किया गया। और फटे हुए एन्यूरिज्म को एक कृत्रिम नाड़ी से बदला गया। सर्जरी के दौरान ही रोगी को 5 से 6 यूनिट ब्लड की चढ़ाई गई जिससे हीमोग्लोबिन को संतुलित किया जा सके।

डाॅ गांधी ने यह भी बताया कि महाधमनी जिर्से एओटा कहते है, शरीर में खून प्रदान करने की प्रमुख रक्त वाहिका होती है। ऐसे में इस धमनी के निचले हिस्से पर एन्यूरिज्म के फटने से रक्तस्त्राव अत्यधिक हो जाता है जिससे मृत्यु की आशंका काफी अधिक हो जाती है। साथ ही फटे हुए एन्यूरिज्म की आपातकालीन सर्जरी काफी खतरनाक होती है क्योंकि केवल 10 प्रतिशत रोगी ही सफल सर्जरी के परिणामस्वरुप जीवित रह पाते है। इसमें कुल मृत्यु दर 90 प्रतिशत है।

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