Monday , 16 September 2019
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नई स्टडी: किसानों में गुर्दे रोग की प्रबल संभावनाएँ

नई स्टडी: किसानों में गुर्दे रोग की प्रबल संभावनाएँ

लॉस एंजेल्स 20 मई (उदयपुर किरण) अमेरिका की कोलोरोड़ो यूनिवर्सिटी के दो वरिष्ठ वैज्ञानिक-चिकित्सकों ने अपनी वर्षों की एक स्टडी के हवाले से दावा किया है कि कृषि क्षेत्र, ख़ास तौर पर गन्ने, कपास और मक्का की खेती में काम करने वाले मज़दूरों में गुर्दे के रोग की प्रबल संभावनाएं होती हैं. इससे जान का जोखिम कई गुणा बढ़ जाता है.

कोलोरोड़ो यूनिवर्सिटी के दो चिकित्सकों डा॰ सी यू आन्शुट्स और ड़ा॰ रिचर्ड जानसन ने कहा है कि खेतीबाड़ी में सतत काम करने वाले मज़दूरों को उच्च तापमान, विषाक्त कीटनाशक और संक्रमण आदि से चिरकालिक गुर्दे का रोग हो जाता है. इसके लक्षणों में उच्च रक्तचाप, ख़ून की कमी, हड्डियाँ कमज़ोर होना और स्नायु तंत्र का शिथिल पड़ना है. उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में काम करने वाले किसानों को गुर्दा रोग की शिकायतें लगभग ना के बराबर मिली हैं.
 डाक्टर जानसन ने परामर्श दिया है कि खेतीबाड़ी में काम करने वाले मज़दूर काम के दौरान बीच बीच में विश्राम करें, उच्च तापमान में काम करने से बचें और शरीर में पानी की कमी नहीं होने दें. उन्होंने कहा है कि कैलिफ़ोर्निया और सेंट्रल अमेरिका में इन्हीं परिस्थितियों में काम करने के कारण सन 1990 में 2012 तक दो दशक में बीस हज़ार किसानों की गुर्दा रोग से मृत्यु हो गई थी. उन्होंने कहा कि गन्ना की खेती में काम करने वाले किसानो को हेंटावायरस और लेपटोस्पिरोसिस संक्रमण हो जाते हैं. उन्होंने कहा है कि श्री लंका में उथले नलकूप और विषाक्त कीटनाशक ग्लाइफ़ोसफ़ोरस के उपयोग से किसानों को गुर्दा रोग के परिणाम भुगतने पड़े हैं. इन कीटनाशकों के उपयोग से ‘नेफ्रोटाक्सिक’ लक्षणों से जूझना पड़ा है.
 हालाँकि उन्होंने यह भी कहा है कि गुर्दा रोग का एक बड़ा कारण मधुमेह और उच्च रक्तचाप है. भारत में मधुमेह और उच्च रक्तचाप से आधे मरीज़ गुर्दे के रोग के शिकार हो जाते हैं. उन्होंने अमेरिका के नेशनल किडनी फ़ाउंडेशन के आँकड़ों के आधार पर कहा है कि अमेरिका में गुर्दा रोग से तीन करोड़ मरीज़ पीड़ित हैं.

 

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