Wednesday , 16 October 2019
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जीवन्ता हॉस्पिटल ने 475 ग्राम और 617 ग्राम के प्रीमैचुअर जुड़वाँ बच्चों को दिया नया जीवनदान –   देश में बचे हुए सबसे छोटे जुड़वा बच्चों में से एक

जीवन्ता हॉस्पिटल ने 475 ग्राम और 617 ग्राम के प्रीमैचुअर जुड़वाँ बच्चों को दिया नया जीवनदान – देश में बचे हुए सबसे छोटे जुड़वा बच्चों में से एक

उदयपुर। राजस्थान स्थित जीवन्ता चिल्ड्रन हॉस्पिटल ने पुनः एक बार इतिहास रचते हुए मात्र 26  हप्तों में जन्में जुड़वाँ बच्चों को  , जिनका वजन था मात्र  475  ग्राम व 617 ग्राम को नया जीवनदान दिया है . जो की भारत  देश में बचे हुए सबसे छोटे जुड़वा बच्चों में से एक है. 126 दिनों के जीवन व मौत के बीच चले लम्बे संघर्ष के बाद आखिरकार यह जुड़वाँ बच्चें वर्तमान में  1.7  किग्रा व 1.95 किग्रा के हो गए हैं .

हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. सुनील जांगिड़ ने  बताया कि मोन्द्रन, जालोर  निवासी शोभा कुंवर और गणपतसिंह  दम्पति को शादी के 27 साल बाद जुड़वाँ बच्चे होने का सौभाग्य मिला.   लेकिन  26 सप्ताह यानि 6 महीने के गर्भावस्था काल में ही प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी, गर्भाशय का पानी लगभग खत्म हो गया था। इसलिए आपातकालीन सिजेरियन ऑपरेशन से जुड़वाँ बच्चों का जन्म 20 जनवरी 2018 को कराया गया. जन्म के वक्त पहले शिशु का वजन 475 ग्राम और दूसरे का मात्र 617 ग्राम  था। जन्म पर शिशु खुद से श्वांस नहीं ले पा रहे थे,उनका शरीर नीला पड़ता जा रहा था।   जीवन्ता चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ सुनील जांगिड़, डॉ निखिलेश नैन, डॉ कपिल श्रीमाली  एवं उनकी टीम ने डिलीवरी के तुरंत पश्चात नवजात  शिशुओं के फेफड़ों में नली डालकर पहली श्वांस दी एवं नवजात शिशु इकाई एनआईसीयू में अति गंभीर अवस्था में वेंटीलेटर पर भर्ती किया। शादी के 27 वर्ष बाद मिले दोनों बच्चें ही इस दम्पति की आखरी उम्मीद थी और वे हर हालत में इन्हें बचाना चाहते थे। . उनको डॉ सुनील जांगिड़ की टीम जीवन्ता  पर पूरा भरोसा था, जो पहले भी 400  ग्राम वजनी प्रीमयचुअर  शिशु को जीवनदान दे चुके है.

नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ सुनील जांगिड़ ने बताया की   इतने कम दिन व कम  वजन  के शिशुओं    को बचाना एक  चुनौतीपूर्ण था। ऐसे कम दिन एवं बच्चे का शारीरिक  सर्वांगीण विकास पूरा हुआ नहीं होता  , शिशु  के फेफड़े , दिल, पेट की आते , लिवर, किडनी, दिमाग, आँखें, त्वचा  आदि सभी अवयव अपरिपक्व, कमजोर एवं नाजुक  होते है  और इलाज के दौरान खाफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है.   I हमेशा आप को एक नाजुक सी डोर पे चलना होता है और कभी कभी सारी कोशिशों के बाद भी सफलता नही मिल पाती.  हलकी सी आवाज, हलचल  या ज़रा सी भी ज्यादा दवाई की मात्रा  से ऐसे शिशु के दिमाग में रक्तस्त्राव होने का खतरा होता है.बेहतरीन इलाज़ के बावजूद भी केवल 20% -30% शिशु के  बचने की संभावना होती है  और केवल 5%- 10 %  शिशु   मस्तिष्क क्षति के बिना जीवित रहते है.

फेफड़ों के विकास के लिए फेफड़ों में दवाई डाली गयी . प्रारंभिक  दिनों में  शिशुओं  की नाजुक त्वचा से शरीर के पानी का  वाष्पीकरण होने के वजह से उनका  वजन  और कम हो गया था . पेट की आंतें अपरिपक्व एवं कमजोर होने के कारण , दूध का पचन संभव नहीं था. इस स्थिति में शिशु के पोषण के लिए  सभी आवश्यक पोषक तत्व – ग्लूकोज़, प्रोटीन्स एव वसा उसे नसों के द्वारा दिए  गए.  धीरे धीरे बून्द बून्द दूध, नली के द्वारा दिया गया. शिशुओं   को कोई संक्रमण न हो इसका विशेष ध्यान  रखा गया.  शुरुवाती  2 ½  महीने तक श्वसन प्रणाली एवं मस्तिष्क  की अपरिपक्वता के कारण  ,  शिशु सांस लेना भूल जाते  थे   एवं  कृत्रिम  सांस की जरुरत पड़ती थी.  70  दिनों के बाद शिशु स्वयं श्वास लेने में समर्थ हुए  . शिशुओं की  126  दिनों  तक आई सी यु में देखभाल की गयी .  शिशुओं के दिल, मस्तिष्क , आँखों की नियमित रूप से चेक अप किया गया . आज 4  महीने बाद उनका  वजन  1700  ग्राम और 1975 ग्राम  है ,स्वस्थ है एवं घर  जा रहे है.

पिता  गणपतसिंह  ने कहा की हम जीवन्ता हॉस्पिटल के आभारी है. आज दोनों  बच्चों  को गोद में लेकर बहुत ख़ुशी हो रही है और  इनका बचना कोई चमत्कार से कम नहीं है। डॉ सुनील जांगिड़ ने बताया की ज्यादातर इतने कम वजनी व कम दिन के जुड़वाँ शिशुओं में  सारी कोशिशों के बाद भी  सिर्फ एक शिशु को ही बचाया जा सकता. आज कल  नवीनतम अत्याधुनिक तकनीक , अनुभवी नवजात शिशु विशेषज्ञ  डॉक्टर्स व प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की  टीम से 500 से 600 ग्राम के प्रीमैचुअर शिशु का बचना भी सम्भव हो चूका है. जीवन्ता हॉस्पिटल ने पिछले  4 साल में कई 6 मासी गर्भावस्था एव 500 से 600 ग्राम के बच्चों का सफल  इलाज  किया  है  और हाल  में ही जीवन्ता हॉस्पिटल ने  दक्षिण एशिया व भारत देश की सबसे छोटे 400 ग्राम वजनी मानुषी का सफल ईलाज भी किया है और वो आज पूरी तरह से स्वस्थ है.

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