Sunday , 21 July 2019
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चमकी से मरनेवाले बच्चों को जिस रात बुखार चढ़ा उस रात वह भूखे पेट सोए थे

चमकी से मरनेवाले बच्चों को जिस रात बुखार चढ़ा उस रात वह भूखे पेट सोए थे

पटना, 25 जून (उदयपुर किरण) .बिहार के मुजफ्फरपुर में एईएस यानी चमकी बुखार से मरनेवाले बच्चों को जिस रात इस बुखार ने अटैक किया उस रात बच्चे भूखे पेट सोए थे. पीड़ित बच्चों की  सामाजिक- आर्थिक स्थिति और उनके परिवेश की जानकारी लेने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर किये गए सर्वे में यह खुलासा हुआ है. मुख्यमंत्री के आदेश पर मुजफ्फरपुर जिले के 14 प्रखंडों में यह सर्वे किया गया. जिन 289 बच्चों के बारे में जानकारी ली गई उनमें से 61 बुखार  चढ़ने से पूर्व रात में खाली पेट सोए थे. इस रिपोर्ट के अनुसार बीमार बच्चों में से 136 बच्चों के परिजनों को मुफ्त एम्बुलेंस सेवा 102 की जानकारी नहीं थी. सर्वे करनेवालों को 205 बच्चे ऐसे मिले जो बीमार पड़ने से पहले कड़ी धूप में खेलने गए थे. स्वच्छता अभियान के तहत शौचालयों के बड़ी संख्या में निर्माण के दावे और सरकारी स्तर पर आंकड़े दिए जाने के बावजूद 289 पीड़ितों में से 170 के घर में शौचालय नहीं था. जागरूकता अभियान वर्ष पर्यंत चलाने का दावा किया जाता रहा है फिर भी राजधानी पटना से लगभाग सौ किलोमीटर दूर जागरूकता की ऎसी स्थिति है. पांच सौ से अधिक पीड़ित परिवारों की सामाजिक- आर्थिक स्थिति और उनके परिवेश का सर्वे होना बाकी है. सर्वे रिपोर्ट आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो कर उभरेगी.

इस बीच बिहार के खाद्य आपूर्ति मंत्री मदन साहनी ने इस रिपोर्ट के सन्दर्भ में मंगलवार को संवाददाताओं के साथ बातचीत करते हुए कहा कि बच्चों के पास अनाज नहीं पहुंचना सम्भव नहीं लगता. उन्होंने कहा कि इस बुखार से मरने वाले बच्चों के भूखे पेट सोने की जानकारी मिलते ही उन्होंने पूरे मामले की जांच का आदेश दिया था.उन्होंने कहा कि खाद्य आपूर्ति विभाग के प्रधान सचिव मामले की जांच कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट आने पर दोषी के खिलाफ कार्रवाई  की जायेगी. उल्लेखनीय है कि मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से बड़ी तादाद में बच्चों की मौत के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अस्पताल का दौरा कर सम्बंधित  अधिकारियों को कई दिशा निर्देश दिए थे . नीतीश कुमार ने पीड़ित परिवारों की सामाजिक – आर्थिक और उनके परिवेश की स्थिति का भी सर्वे कर वस्तुस्थिति का पता लगाने को कहा था. इस बुखार से लीची  में पाए जाने वाले रसायन को जोड़े जाने की भी नीतीश कुमार ने जांच करने को कहा था. उन्होंने यह भी पता लगाने को कहा था कि बीमार पड़ने वाले बच्चों ने क्या लीची खाई थी, और कितनी खाई थी ? लीची के साथ-साथ गर्मी और ऊमस को भी बीमारी  बढ़ने की वजह में शामिल किया गया था, उसकी जांच करने को भी नीतीश कुमार ने कहा था.

दरअसल यह बुखार मुजफ्फरपुर में हर साल होता है, जिससे बच्चों की मौत हुई है, कभी कम तो कभी अधिक. हरसाल इस बीमारी के लिए लीची को दोषी ठहराया गया है, किन्तु अभी तक इस सन्दर्भ में किसी तरह का शोध नहीं किया गया है, जिसकी वजह से यह एक अनुमान बन कर रह गया है. हालांकि लीची खाने से कुछ परिस्थिति विशेष में दिमाग में चीनी की कमी होती देखी गई है. ‘द लैन्सेट’ मेडिकल जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट की मानें तो मीठा और उष्णकटिबंधीय फल, लीची में प्राकृतिक रूप से हाइपोग्लाइसिन ए और मिथाइलएन्सैक्लोप्रोपाइलग्लाईसीन पाया जाता है जो शरीर में फैटी ऐसिड मेटाबॉलिज़म में रुकावट पैदा करता है. लीची और सोपबेरी (सेपिन्डेसी) प्रजाति के अन्य फलों में असामान्य अमीनो एसिड ( अम्ल) पाया जाता है जो ग्लूकोनेोजेनेसिस और फैटी एसिड के बीत (β)-ऑक्सीकरण को बाधित करते हैं. सेपिन्डेसी प्रजाति के अपरिपक्व फल के सेवन से बच्चों में एक विषाक्त हाइपोग्लाइकेमिक एन्सेफैलोपैथी पैदा हो सकता है. द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में, प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में एन्सेफैलोपैथी के लिए लीची को ज़िम्मेदार माना गया है. भारत के भी कुछ शोधकर्ताओं ने लीची को की इस तरह की बीमारी के लिए दोषी माना था. पब्लिक हेल्थ साइंटिस्ट डा धीरेन्द्र नारायण सिन्हा ने बीमारी के संदर्भ में बताया कि लीची में पाया जानेवाला रसायन शरीर के विशिष्ट अंग -दिमाग में शुगर की मात्रा काफी कम कर देता है. मुज़फरपुर में बच्चों में फैली बीमारी के रोगियों के खून के नमूने की जांच में वायरल बुखार के लक्षण नहीं मिलने पर इस रोग को लीची से जोड़ा जा सकता है. गर्मी भी उन्होंने वक्त किया.

लीची में पाए जाने वाले रसायन के प्रभाव से होनेवाली बमारी की तीव्रता बच्चे की क्षमता, उसकी उम्र तथा पोषण, खाए गए फलों की संख्या और उसमें पाए जाने वाले हाइपोग्लाइकेमिक अमीनो एसिड की मात्रा ( सांद्रता) पर निर्भर करता है. लैंसेट के शोध में कहा गया है कि लीची के अधपके फल में हाइपोग्लाइसिन ए (एमपीसीए) और मिथायलीन साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसिन (एमसीपीजी) दो तरह के टॉक्सिन पाए जाते हैं. सीरम ग्लूकोज की सांद्रता ( मात्रा) के जरिये लीची एन्सेफैलोपैथी को काबू में किया जा सकता है. लीची प्रजाति के फल को यदि कम मात्रा में खाया जाए तो इस बीमारी के होने की सम्भावना कम रहती है. लीची का व्यावसायिक उत्पादन होने वाले स्थानों पर कुपोषण के शिकार बच्चे पेड़ से जमीन पर गिर कर खराब हो जाने वाली और अधपकी लीची का जब सेवन करते हैं तो वैसे स्थानों पर लीची से होने वाले मौसमी विषाक्त हाइपोग्लाइकेमिक एन्सेफैलोपैथी की सम्भावना अधिक रहती है. हाइपोग्लाइकेमिक एन्सेफैलोपैथी के लक्षण वायरल बुखार या जापानी बी इंसेफेलाइटिस के लक्षण से मिलते जुलते हैं. अभी तक किसी भी बड़े देश के इस बीमारी के चपेट में नहीं आने की वजह से इसके लिए अभी तक दवा बनाने वाली कंपनियों ने कोई सार्थक दवा का उत्पादन नहीं किया है. डा धीरेन्द्र नारायण सिन्हा ने कहा कि लीची में मिलनेवाले विषैले रसायन हाइपोग्लाइकेमिक के विषैलेपन को गर्मी किस तरह प्रभावित करती है, इसका रासायनिक विश्लेष्ण आवश्यक है.

लीची के उत्पादन, मिट्टी, जलवायु और फसल की प्रकृति में हाइपोग्लाइकेमिक एसिड का स्तर किस तरह भिन्न होता है, द लैंसेट जर्नल ने भी इस पर शोध की आवश्यकता बताया है. लीची में पाये जाने वाले ओर्गानिक एसिड मैलिक अम्ल है जिसकी मात्रा फल में शुरू में अधिक रहती है और फल के पकने के साथ-साथ कम होती जाती है. एमपीसीए से हाइपोग्लाइसीमिया या कोई दिमागी बीमारी हो सकती है पर ये इस बात पर निर्भर करता है कि इसकी कितनी खुराक शरीर में पहुंची है. बच्चे कई बार जमीन पर गिरी लीचियों से ही अपने भोजन की जरूरत पूरी करते हैं. शाम का खाना न खाने से रात को हाइपोग्लाइसीमिया ( दिमाग में शुगर की मात्रा कम हो जाने) की समस्या हो जाती है, खासकर उन बच्चों के साथ जिनके लिवर और मसल्स में ग्लाइकोजन-ग्लूकोज की स्टोरेज बहुत कम होती है. इससे शरीर में उर्जा पैदा करने वाले और ग्लूकोज बनाने वाले फैटी ऐसिड्स का ऑक्सीकरण हो जाता है और मस्तिष्क संबंधी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं तथा दौरे पड़ने लगते हैं. अगर रात का खाना न खाने की वजह से शरीर में पहले से ब्लड शुगर का लेवल कम हो और सुबह खाली पेट लीची खा ली जाए तो अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

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