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कालमेघ : सहफसली के रूप में करें खेती, आय के साथ रोगों के लिए नहीं जाना पड़ेगा अस्पताल

कालमेघ : सहफसली के रूप में करें खेती, आय के साथ रोगों के लिए नहीं जाना पड़ेगा अस्पताल

Lucknow, 26 जून (उदयपुर किरण). कालमेघ अथवा चिरायता अथवा बेलवेन, किरयित आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक औषधीय गुणों से युक्त पौधा है. इसकी पत्तियों में कालमेघीन पाया जाता है, जिसका ज्यादा औषधीय महत्व है. इसके जड़ से लेकर पत्तियों तक का प्रयोग औषधीय के रूप में होता है. पहले Lucknow और आसपास के इलाकों में इसकी खेती बहुतायत में होती थी लेकिन अब खेती का रकबा कम हो गया है. सीमैप के वैज्ञानिकों के अनुसार इसको सहफसली के रूप में अपनाकर किसान आमदनी को बढ़ा सकते हैं. आम, अमरूद, अनार की बागवानी में भी इसकी खेती की जा सकती है.

इस माह में करें रोपण

कालमेघ की फसल जून के दूसरे सप्ताह से जुलाई माह तक क्यारियां बनाकर रोपण करते हैं. भूमि उर्वरता के अनुसार पंक्ति से पंक्ति की दूरी 33-61 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 32-44 सेमी रखते हैं. सहफसली के रूप में खेती करने पर बागवानी के अनुसार इसके पौधों के रोपण के लिए क्यारियों को बनाना चाहिए. आम, अमरूद की बागवानी में इसकी रोपाई करने पर किसान दोगुना लाभ ले सकते हैं. 

बाजार न होने से यूपी के किसानों का मोहभंग

कालमेघ की खेती वर्तमान में मध्यप्रदेश में बहुतायत हो रही है. यूपी में भी इसकी खेती बुंदेलखंड और Lucknow में होती थी लेकिन अब लुप्त प्राय होती जा रही है. इस संबंध में औषधीय पौधों के डीलर दीलिप राय का कहना है कि इसका बाजार भाव मध्यप्रदेश से ही तय होता रहा है. इस कारण यहां लोगों ने धीरे-धीरे इसकी खेती करना बंद कर दिया. अब बहुत ही कम किसान इसकी खेती करते हैं.

कालमेघ की खेती फायदेमंद

बस्ती मंडल के उद्यान विभाग के निदेशक अनीस श्रीवास्तव का कहना है कि किसानों को सह फसली की खेती के रूप में इसको अपनाना चाहिए. इसकी खेती सहफसली के रूप में करने पर किसानों को काफी फायदा मिलेगा. बागवानी में इसको लगाने पर देखभाल के साथ इससे दोगुना फायदा भी होगा.

15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर करें गोबर की खाद का उपयोग

उन्होंने बताया कि इसकी खेती के लिए समतल जमीन का होना उपयुक्त होता है. 15 से 20 टन प्रतिहेक्टेयर की दर से सड़ी गोबर की खाद अथवा पांच टन वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग करना चाहिए. नत्रजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा 80 : 40 : 40 के अनुपात में करना उपयुक्त होता है. रोपाई के बाद तुरंत वर्षा न होने पर सिंचाई करनी चाहिए.

ढाई लाख तक शुद्ध लाभ

सहखेती की अवस्था में इसकी दो कटाई से आठ टन तक सूखी शाक मिल जाती है. चालीस से पचास रुपये प्रति किलो इसका शाक बिक जाता है अर्थात एक हेक्टेयर में सहफसली के रूप में खेती करने पर भी एक हेक्टेयर में लगभग तीन लाख रुपये मिल जाते हैं, जबकि खेती में 45 हजार के लगभग खर्च आता है अर्थात 2.65 लाख रुपये की शुद्ध आय हो जाती है. 

पीलिया, पेचिस आदि में लाभदायक, ज्वर के लिए रामबाण

कालमेघ का स्वाद बहुत कड़वा होता है. इसकी पत्तियां पीलिया, पेचिस, सिरदर्द कृमि, किसी भी तरह के ज्वर के लिए काफी लाभदायक होती है. कालमेघ अथवा चिरायता मलेरिया आदि ज्वर के लिए तो रामबाण है. इसके साथ ही किसी भी तरह का ज्वर हो, यदि दवाओं का असर नहीं हो रहा है और काफी दिन का हो गया है तो ऐसे में डाक्टर भी चिरायता का प्रयोग करने की सलाह देते हैं. इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी ज्यादा होती है. यह लीवर यानी यकृत के लिए एक तरह से शक्तिवर्धक का कार्य करता है. इसका सेवन करने से एसिडिटी, वात रोग और चर्मरोग नहीं होते.

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