Thursday , 17 October 2019
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अश्लीलता फैलाते रियलिटी शो : डॉ. उर्मिल राकेश

आज रियलिटी शो और छोटे परदे के अन्य कार्यक्रमों में अश्लीलता की भरमार हो गई है. इसका प्रभाव मासूम बच्चों पर पड़ रहा है. बच्चों के हुनर की परीक्षा लेने का माध्यम कई और भी हो सकते हैं. क्या अश्लील गानों पर डांस कराना ही एक मात्र हुनर परीक्षण का माध्यम रह गया है? बेशक, हर माता-पिता अपने बच्चों को ऊंचाइयों पर जाते हुए देखना चाहते हैं. लेकिन इसके लिए क्या अश्लीलता फैलाना उचित कहा जाएगा? टैलेंट परीक्षण भक्ति गीतों तथा नृत्य सांस्कृतिक गानों पर भी हो सकता है. लेकिन छोटी-छोटी बच्चियों को उत्तेजक गाने ‘कमरिया’, ‘चुनरिया’, ‘नैनों  के लटके- झटके’ क्यों सिखाया जा रहा है? प्रश्न उठना वाजिब है कि क्या हमारे समाज में मूल्यों का पतन हो गया है? आखिर हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं?

टैलेंट क्या अन्य रसों के परीक्षण से नहीं हो सकता? क्या सिर्फ श्रृंगार ही एक ऐसा रस रह गया है, वह भी भोंडा? यह आज मानव समाज में मंथन का विषय है. जरूरी नहीं कि सरकार इस पर प्रतिबंध लगाये, तभी इनको बंद किया जाएगा. इसके लिए समाज के प्रबुद्धजनों भी आगे आना होगा. इन बातों पर विचार करना होगा कि क्या उपभोक्तावादी नीतियां इतना सिर चढ़कर बोल रही हैं कि आज व्यक्ति अपने मासूम बच्चों तक को भूल गया है. बच्चे शो में एडल्ट एक्शन कर रहे हैं. आखिर इससे भारत का भविष्य किस तरह का होगा?

इस उपभोक्तावादी युग में क्या दर्शक अपनी पुत्रियों-पोतियों को भी इस तरह एन्जॉय करने लगे हैं? निश्चय ही मानवीय मूल्य अपने अवसान के समीप पहुंच गया है. आज मॉडर्निटी का मतलब कुछ और ही समझा जा रहा है. इससे अपनी संस्कृति तो तिरोहित हो ही रही है,संस्कार भी विलुप्त होते जा रहे हैं.

रियलिटी शो में बच्चों को जो नृत्य करते दिखाया जा रहा है, मूल रूप से वह वयस्कों द्वारा अन्य मनोरंजन के साधनों को साधने के लिए किए गए होते हैं. वह वयस्कों के लिए विचारोत्तेजक और उम्र के अनुकूल होते हैं. इस तरह के कृत्य का बच्चों पर गलत प्रभाव हो सकता है. कम उम्र के कारण वे सही-गलत का निर्णय नहीं कर पाते हैं. मंत्रालय की ओर से चैनलों को जारी की गई एडवाइजरी में कहा गया है कि टीवी पर बच्चों को शो में इस तरह के डांस मूव्स करने से रोकें जो कि वयस्क करते हैं. ऐसे में इन नृत्यों को छोटे बच्चों से करवाने पर उनके मानसिक और संरचनात्मक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. इसलिए चैनलों को इस तरह के शो के दौरान सावधानी बरतने की सलाह दी गई है.

मंत्रालय की एडवाइजरी में कहा गया है कि मंत्रालय निजी उपग्रह टीवी चैनलों, केबल टेलीविजन नेटवर्क विनियमन अधिनियम 1995 के तहत निर्धारित कार्यक्रम और विज्ञापन के लिए बनी नियमावली के अनुसार दिए गए प्रावधानों के अनुरूप नियमों के पालन करने की उम्मीद करता है. अतः अब सिने जगत को इस पर विशेष कदम उठाना होगा और ऐसे सभी शो पर प्रतिबंध लगाना होगा, जो बच्चों को एडल्ट शो करने पर विवश करते हैं. साथ ही समाज को भी स्वयं इस पर प्रतिबंध तथा अपने बच्चों को ऐसे शो करने से रोकना होगा. हमें इस बात का पूरा ध्यान देना होगा कि टीवी चैनल पर कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं होना चाहिए जो बच्चों की अभद्र छवि पेश करता है. बच्चों के कार्यक्रमों में नैतिक मूल्यों का लिहाज होना चाहिए. उसमें भाषा की सौम्यता और दृश्यों की शुचिता का ख्याल रखा जाना चाहिए. किसी तरह के हिंसात्मक दृश्य नहीं होने चाहिए. छोटे बच्चों से कोई इस तरह का आयोजन नहीं कराना चाहिए जो वयस्क दृष्टिकोण के हिसाब से हो.

सूचना प्रसारण मंत्रालय के जारी निर्देश में अब यह देखने का विषय है कि क्या इस पर रोक लगाने में सफलता प्राप्त हो पाएगी? इसके लिए टीवी शो और फिल्म उद्योग को स्वयं ही आगे आकर इन पर रोक लगाना चाहिए. उनको अपने इस उपभोक्तावादी नीति से बाहर निकलकर मानवतावादी नीतियों पर भी सोचना चाहिए. तभी इन विकारों पर रोक लगाई जा सकती है. उत्तेजक गानों पर बच्चों से डांस कराकर उनके टैलेंट परीक्षण की  इस मानसिकता से फिल्म जगत को उबरना चाहिए. यहां एक बात गौरतलब है कि आज धीरे- धीरे फिल्म जगत से अपने सांस्कृतिक शो गायब होते जा रहे और उनका स्थान अश्लीलता भरे गाने और शो लेते जा रहे हैं. इन सभी बातों पर सिने जगत को विचार करना चाहिए. उन्हें बच्चों को श्रृंगार रस भरे गानों की बजाय भक्ति और सांस्कृतिक संगीत का चलन अपने रियलिटी शो में लाना चाहिए. अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो समाज में अश्लीलता तो फैलेगी ही, अपराध पर अंकुश लगाना भी मुश्किल होगा.

(लेखिका एंडोक्राइनॉलोजिस्ट हैं.)

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