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Thursday , 23 November 2017

वागड़ में अलौकिक शक्तियुक्त हैं आद्यशक्ति आराधन के नौ धाम

कमलेश शर्मा

राजस्थान का दक्षिणांचल (बांसवाड़ा-डूंगरपुर जिला) वागड़ प्राचीनकाल से ही अपने शिल्प-स्थापत्य, निसर्ग और विशिष्ट परंपराओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध रहा है। गुजरात राज्य से सटे होने के कारण वागड़ में आद्य शक्ति आराधन की परंपरा भी प्राचीनकाल से ही विद्यमान रही है। गुजरात की भांति वागड़ में भी देवी पूजा व नवरात्रि महोत्सव आयोजन का विशेष महत्त्व है। इसका ताजा उदाहरण है वागड़ में जगह-जगह स्थित देवी मंदिर और यहां नवरात्रि व आमदिनों में उमड़ने वाली जनमेदिनी। यों तो वागड़ के हर छोटे-बड़े गांव-कस्बे व शहर में कई सारे देवी मंदिर हैं परंतु अंचल में अलौकिक शक्ति युक्त आभा वाले नौ देवीधाम देश-प्रदेश के देवीभक्तों के आकर्षण का केन्द्र हैं। नवरात्रि के मौके पर आईये जानते हैं वागड़ के ऐसे ही देवी धामों के बारे में :

अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शक्तिपीठ: त्रिपुरा सुंदरी

लोढ़ी काशी के नाम से ख्यात बांसवाड़ा जिले में श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का धाम त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर स्थित है। इस शक्तिपीठ के प्रति न सिर्फ स्थानीय श्रद्धालुओं अपितु कई विशिष्ट-अतिविशिष्टजनों की आस्थाएं जुड़ी हुई है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के कई ख्यातनाम राजनीतिज्ञों की श्रद्धा के केन्द्र होने के कारण देवी त्रिपुरा के दरबार में देवीभक्तों का सैलाब उमड़ता ही रहता है।  जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर तलवाड़ा कस्बे के समीप उमराई गांव में स्थित शक्तिपीठ त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर में देवी की सिंह पर सवार अष्टादश भुजा वाली विशाल प्रतिमा है जिसे  श्रद्धालु त्रिपुरा सुंदरी, तरतई माता व त्रिपुरा महालक्ष्मी के नाम से संबोधित करते है। श्यामवर्णा विशाल पाषाण प्रतिमा का ओज कुछ खास ही है जो श्रद्धालुओं को दूर से ही सम्मोहित करता प्रतीत होता है। देवी प्रतिमा का प्रतिदिन अलग-अलग रंगों के वस्त्राभूषणों में श्रृंगार किया जाता है। रविवार को पीला श्रृंगार देवी प्रतिमा की विशिष्टता है। इस मंदिर की गिनती प्राचीन शक्तिपीठों में होती है। देवी के चरणों के नीचे श्री यंत्र अंकित होने के कारण इसका विशेष महत्त्व है। मंदिर में विक्रम संवत 1540 का एक शिलालेख है। अनुमान है कि मंदिर सम्राट कनिष्क के काल से पूर्व का है। इस आस्थाधाम के बारे में माना जाता है कि यहां आसपास गढ़पोली नामक महानगर था। जिसे दुर्गापुर कहते थे। इस नगर का शासक नृसिंह शाह था। इसी लेख में त्रिपुरारी शब्द का उल्लेख है। यह भी बताया जाता है कि इस मंदिर के आसपास तीन दुर्ग थे, जिनके नाम शीतापुरी, शिवपुरी व विष्णुपुरी था। इन तीनों दुर्गों के बीच में मंदिर होने से इसे त्रिपुरा कहा जाने लगा। मंदिर में चैत्र व आश्विन नवरात्रि पर विविध धार्मिक आयोजन होते है और इस दौरान इस धाम पर देवीभक्तों का सैलाब उमड़ता रहता है। हाल ही में इस तीर्थ

वागड़ का पावागढ़: नन्दनी माता

गुजरात के प्रसिद्ध देवी तीर्थ पावागढ़ का प्रतिरूप एक ऐसा ही देवीधाम है बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूरी पर बड़ोदिया कस्बे के पास स्थित नन्दनी माता तीर्थ, जिसे यहां के श्ऱद्धालु ‘वागड़ का पावागढ़’ के नाम से जानते हैं। नेशनल हाईवे 113 पर सड़क किनारे छितराई अरावली पर्वतश्रृंखला की एक विशाल पर्वतचोटी पर अवस्थित देवी तीर्थ नन्दनी माता श्रद्धालुओं की आस्थाओं का  प्रमुख धाम है। विशाल पर्वत पर स्थित होने पर भी श्रद्धालुओं के लिये यह स्थान अब दुर्गम नहीं है क्योंकि पहाड़ की तलहटी से ही पश्चिम और पूर्व भाग में 500-500 व्यवस्थित सीढि़यॉं बनाई जा चुकी हैं। इस विशाल पहाड़ी पर चढ़ने के रोमांचक अनुभव के साथ ही जिले की सरहदों को उंचाई से देखने के आनंद उठाने के लिये श्रद्धालु यहां नवरात्रि व अवकाश के दिनों के आते रहते है। नन्दनी माता तीर्थ पर मुख्य मंदिर में देवी नन्दनी की श्वेत वर्णा पाषाण प्रतिमा है सिंहवाहिनी अष्टभुजाधारी मां नन्दनी के  प्रति यहां की आदिम संस्कृति में बेहद आस्थाएं है। मां नन्दनी के बारे में कहा जाता है कि यह वही देवी है जो द्वापर युग में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हुई व जिसे कंस ने देवकी की आठवीं संतान समझकर मारने का यत्न किया था। कंस के हाथों से मुक्त होकर यह देवी आकाश मार्ग से यहां इस पर्वत पर आकर स्थापित हुई। नन्दा नामक इसी देवी का उल्लेख दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के 42 वें श्लोक में मिलता है।

‘‘नन्दगोपगृहे जाता, यशोदा गर्भ संभवा,

ततस्तौ नाशयिष्यामि विंध्याचल निवासिनी ।।’’

साथ ही दुर्गा सप्तशती के मूर्तिरहस्य प्रकरण में देवी की अंगभूता छः देवियों में नंदा देवी को ही सबसे पहले उल्लिखित किया गया है। आदिवासियों के प्राचीन गरबों और गीतों में आज भी इस देवी की प्राचीनता का बखान प्रमुखता से प्राप्त होता है। नन्दनी माता के बारे में माना जाता है कि यह देवी पहले होली पर्व पर आयोजित होने वाली पारंपरिक रस्म गैर नृत्य खेलने के लिये नारी रूप धारण कर आसपास के गांवों में आती थी और आम जनों के साथ गैर नृत्य खेलती थी परंतु कुंहार जाति के एक व्यक्ति द्वारा यह भेद जानने का दुस्साहस किया गया और देवी ने उसे श्राप दे दिया। कहा जाता है कि देवी द्वारा दिये गये श्राप के कारण ही आज भी बड़ोदिया कस्बे में कुंहार जाति का स्थायी वास नहीं हो पाया है। बड़ोदिया में वर्तमान कुंहार जाति के वाशिन्दें समीपस्थ गांवों के मूल निवासी माने जाते है।

चौहानों की कुलदेवी: आशापुरा माता

निठाउवा-गामड़ी कस्बे में स्थित आशापुरा माता का धाम वागड़भर में देवीभक्तों की आस्थाओं को प्रमुख धाम है। देवी आशापुरा चौहानों की कुलदेवी मानी जाती है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में देवी की कृष्णवर्णा पाषाण की विशाल प्रतिमा स्थापित है। माना जाता है कि आठ सौ से अधिक वर्ष पुरानी है और रथ पर आरूढ़ है। मूल प्रतिमा जमीन से उपर है और देवी का रथ जमीन में दबा हुआ है। बताया जाता है कि यह प्रतिमा पृथ्वीराज चौहान ने ने निगम बोधघाट दिल्ली में स्थािपत की थी परंतु युद्ध में परास्त होने के बाद वह इस प्रतिमा को रणथभौर, नाड़ोल इत्यादि जगहों से होते हुए सुरक्षित स्थान मान यहां लाकर स्थापित किया। जानकार बताते हैं कि प्रतिमा का एक हाथ कटा हुआ है और इसके पीछे किंवदंती है कि देवी का यह स्वरूप घायल अवस्था का है। देवी के प्रति वागड़ अंचल के देवी भक्तों की अगाध आस्थाएं हैं और यहंा पर बारहोंमास दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।

आस्था धाम – दक्षिण कालिका

बांसवाड़ा जिला मुख्यालय पर स्थित दक्षिण कालिका माता मंदिर श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केन्द्र है। वर्षभर के चारों नवरात्रि में यहां विविध धार्मिक अनुष्ठान होते रहते है। चैत्र व शारदीय नवरात्रि में यहां दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। जनमान्यता है कि यहां पर आने वाले सभी धर्मानुरागियों की कामनाओं की पूर्ति होती है। मंदिर परिसर में इसकी स्थापना के संदर्भ में एक शिलालेख लगा हुआ है। जिस पर लिखा हुआ है कि

माघे शुक्ल दशम्यां हि विक्रमीयो न विंशके।

शते सप्त्नवत्युर्ध्वे पृथ्वीसिंहे न भू भृता।।

अर्थात मंदिर की स्थापना संवत् 1997 में माघ माह की दशमी तिथि को बांसवाड़ा महारावल पृथ्वीसिंह जी द्वारा करवाई गई थी। वर्तमान में यह मंदिर देवस्थान विभाग के अधीन है। इस मंदिर के परिसर में ही श्री दक्षिणेश्वर महोदव मंदिर की भी स्थापना की गई है। समीप ही विशाल यज्ञ मण्डप भी बना हुआ है। जहां समय-समय पर विप्रवरों द्वारा धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होते है। दर्शनार्थी मंदिर प्रांगण में लगे पीपल की पूजा अर्चना करते हैं।

महिषासुरमर्दिनी देवी: आमझरा की करहर माता

डूँगरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 32 किलोमीटर दूरी पर पुरातात्विक महत्त्व के स्थल के रूप में आमझरा गांव को विशेष ख्याति प्राप्त है। उत्खनन दौरान यहां पर गुप्तकालीन संस्कृति के महत्वपूर्ण अवशेष पाए गए हैं। यहां से 5वीं-6ठी शताब्दी की मूर्तियाँ पाई एवं अवशेष राजकीय संग्रहालय में संरक्षित है। गांव में आज भी उत्खनन दौरान प्राप्त महिषासुरमर्दिनी देवी की पुरानी मूर्ति है, जिसे स्थानीय लोग ‘करहर माता’ के नाम से पूजते हैं। यहीं पर गजलक्ष्मी की दुर्लभ प्रतिमा के साथ  शिवलिंग व गणेश प्रतिमाएं भी देवी मंदिर में विद्यमान हैं। इस मंदिर के प्रति भी स्थानीय लोगों की अगाध श्रद्धाएं हैं और देवी तीर्थ के पूजन व दर्शन के लिए बड़ी संख्या में देवीभक्त पहुंचते हैं।

परमारवंशीय शासकों की साधना का केन्द्र: गलियाकोट की शीतला माता

डूंगरपुर जिलांतर्गत माही नदी के किनारे-किनारे स्थित ऐतिहासिक महत्व के स्थल गलियाकोट में शीतला माता का प्राचीन मन्दिर है। परमार वंश के राजाओं की जागीर रहे इस स्थान पर यह देशभर में एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसकी आज भी छत नहीं बनाई गई है। शीतला माता का यह प्राचीन मन्दिर शाक्त साधना का केन्द्र रहा है। गर्भगृह में देवी शीतला की स्वयभू श्वेेत प्रस्तर की प्रतिमा के बारे में बताया जाता है कि यह प्रतिमा 13 फीट बड़ी है और इसका आधे से ज्यादा भाग जमीन में दबा है। बड़ी संख्या में चर्म रोगों से ग्रस्त लोग यहां पर आते हैं और देवी की मन्नत मांगते है। लोक मान्यतानुसार के अनुसार इस देवी तीर्थ का संबंध गुजरात के प्रसिद्ध शक्तिपीठ पावागढ़ से है। देवी शीतला के प्रति श्रद्धालुओं में अगाध आस्थाएं है। इस कारण मन्दिर में श्रद्धालुओं का जमघट लगा ही रहता है।

आरोग्यदाता धाम: देवी विजवा माता

डूंगरपुर जिलांतर्गत आसपुर क्षेत्र के मोदपुर गांव के समीप विंध्यवासिनी देवी का मन्दिर आरोग्यदाता धाम के रूप में दूर-दूर तक विख्यात है। मन्दिर के गर्भ गृह में देवी की ओजपूर्ण मूर्ति है जिसे भक्तजन विजवा माता के नाम से पूजते हैं। मंदिर की प्राचीनता के प्रमाण स्वरूप यहां 13वीं शताब्दी का शिलालेख उपलब्ध है।  प्रत्येक रविवार और नवरात्रि पर्व दौरान यहां पर मेला लगता है। बड़ी तादाद में लकवा व अन्य रोगग्रस्त व्यक्ति देवी दर्शन कर रोगमुक्ति की आशा से यहां पहुंचते हैं।

प्रजावत्सला देवी वसुन्धरा

डूंगरपुर जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर पूर्व में वसुन्दर गांव के समीप पहाड़ों के मध्य खोह में वसुन्दरा (वसुन्धरा) देवी का पुराना मन्दिर है। देवी को प्रजावत्सला माना जाता है। यहीं एक जलकुण्ड भी है जिसमें पर्वत शिलाओं से रिसकर शीतल जल भरता रहता है। लोकमान्यता है कि इस कुण्ड के पवित्र व औषधीय जल के स्नान से चर्मरोग शान्त होते हैं। वर्षा के मौसम में यहां का दृश्य अत्यन्त मनोरम हो उठता है और वसुन्धरा का हरित श्रृंगार देखते ही बनता है।  इतिहास गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार यहां प्राप्त शिलालेख मेवाड़ के कुण्डागांव में प्राप्त राजा अपराजित के शिलालेख के समकालीन है। रियासतकाल में यह प्रमुख शिकारगाह रहा है।

अर्द्धनारीश्वर प्रतिमायुक्त है विराट का अंधेरी माता मंदिर

डूंगरपुर जिलांतर्गत ओबरी कस्बे के समीप पुरातात्विक महत्ता वाले विराट गांव में सुप्रसिद्ध अंधेरी माता का विशाल मंदिर है। मंदिर के गर्भगृह में देवी की अर्धनारीश्वर स्वरूप की विशाल दुर्लभ प्रतिमा है। कृष्ण पाषाण निर्मित इस प्रतिमा की विशेषता यह भी है कि इसी प्रतिमा पर श्री गणेश व कार्तिकेय सहित पूरा शिवपरिवार उकेरा हुआ है। यह एक स्वप्नादेशित स्थापित प्रतिमा है और अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण यह प्रतिमा देशभर में दुर्लभ प्रतिमा है। इस मंदिर का गुंबज 151 फीट ऊॅंचाई का है और इस निर्माण के पीछे मान्यता है कि इस ऊॅंचाई से देवी तीर्थ पावागढ़ की ज्योत दिखाई दे सकती है। यह एक पुरातात्विक स्थल भी है और यहां पर आज भी महाभारतकालीन अवशेष प्राप्त होते हैं। मान्यता है कि पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास का कुछ समय यहीं पर व्यतीत किया था।

इन देवी धामों के अतिरिक्त भी दोनों जिलों में कई देवीधाम है जो अपनी भांति-भांति की विशेषताओं वाले हैं। इन धामों पर वर्षभर में आने वाली तीनों नवरात्रि पर्वों के साथ रविवार व अन्य दिनों में श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहता है। अधिकांश देवीतीर्थों पर नवरात्रि दौरान गरबों और विशेष पूजा-अर्चना का भी आयोजन होता है।

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