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Thursday , 23 November 2017

कार्तिकी प्रतिपदा : गोपर्व

श्रीकृष्ण ‘जुगनू’

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा नववर्षारंभ के रूप में तो मनाई जाती है ही, यह गोपर्व भी है और गोचारण में सहायक लगुड़ या यष्टि अथवा लकुटि-लकड़ी के लिए “लगुड प्रतिपदा” के नाम से भी जानी जाती है। पराशर लिखित ‘कृषि पराशर’ में इस एक मात्र पर्व का उल्लेख मिलता है। कृषि पराशर के श्लोक बृहत्संहिता (587ई.) में भी उद्धृत हैं। इस दिन श्यामलता बांधकर गायों व बैलों को सजाया जाता। उनको तेल व हल्दी के पंचांगुलिक छापे लगाए जाते और पूजा जाता, उनको भड़काकर वर्षभर निरोग रखने का प्रयास किया जाता :

गोपूजां कार्तिके कुर्याल्लगुड प्रतिपत्तिथौ।
बद्ध्वा श्यामलतां शृंगे लिप्त्वा तैलं हरिद्र्या।।
कुंकुमैश्चन्दनैश्चापि कृत्वा चांगे विलेपनम्।
उद्यमश्च लगुडं हस्ते गोपाला: कृतभूषणा:।।
ततो वाद्यैश्च गीतैश्च मंडयित्वाम्बरादिभि:।।
भ्रामयेयु: वृषं मुख्यं ग्रामे गोविघ्न शान्तये।। (९९-१०१)

यह परंपरा आज तक हमारे यहां प्रचलित है। गायों का सिंगार और खैंखरा होता है। संध्या काल में सजे धजे बैलों को गांव में ‘गवली स्थान’ पर लाकर मुखिया के हाथों पूजन करवाया जाता है…। हीडों जैसे बृहद गीतों व गाथाओं का गान होता है। ये ही मेरे शोध के विषय रहे हैं। सचमुच कृषकों और भारतीय कृषि संस्कृति का यह सबसे प्रमुख पर्व रहा है। सबको बधाई…।

चित्र : Madan Meena & Lalit Sharma

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